सुंदर देश, सुंदर लोग

07 January 2019Sonu Kanojiya

हिन्दुस्तान में एक कहावत है कि अगर लोग अच्छे हो तो देश भी अच्छा होता है और ऐसे ही कुछ अच्छे लोगो से मेरी मुलाकात हुई उड़ेरी, सोमेश्वर, उत्तराखंड़ में। यह मौका मुझे तब मिला जब मेरे बचपन के दोस्त हरीश ने मुझे और अरुण को अपने गाँव आने का निमंत्रण दिया। बात दिसम्बर 2008 की है, मै और अरुण दोनो ही अपनी पढाई काँलेज मे कर रहे थे और हमारे पास घूमने का पर्याप्त समय था, इसलिए हमने इस निमंत्रण को स्वीकार किया और सराय काले खाँ से सोमेश्वर से होकर जाने वाली बस पकड़ ली। तब हमें कुछ ₹250 की टिकट लेनी पड़ी। सफर नीरस ही होता, अगर अरुण का पेट शान्त रहता, पर हमेशा की तरह उसके पेट को कुछ रोमांचक करना था। जैसे ही पहाड़ो में बस पहुंची, अरुण को प्रकृति का बुलावा आ गया। लगभग आधी रात का समय और घने जंगल के बीच बस, जैसे तैसे बस कंड़क्टर से आग्रह करके बस को रुकवा लिया गया। पर बात यही खत्म नही हुई, अल्मोड़ा पहुँच कर अरुण का रोमांच फिर से शुरु हो गया और बस छुटने की नौबत आ गई।

ट्रेकिंग का पहला अनुभव

आखिरकार हम लोग सोमेश्वर पहुंच गए और हरीश हमें लेने आ गया। हमें उसके गाँव उडे़री का रास्ता 3.5 किमी. की चढाई करके पहुंचना था। रास्ता जंगल के बीच से होकर जाता था और कई जगह बहुत संकरा था। ये हमारा पहांड़ो में ट्रेकिंग का पहला अनुभव था। हम जल्दी थक जाते पर कभी दिल में यह ख्याल नही आया की सफर कब खत्म होगा। एक जगह इतना संकरा रास्ता था कि हमें घुटनों के बल चल कर जाना पड़ा। मुझे याद है हमारी पहाड़ी बिच्छु (Stinging Nettle) से पहली मुलाकात।

tinging Nettle. हरीश ने हमें इसे छूने के लिए कहा और तब हमें एहसास हुआ कि इसे बिच्छु क्यूं कहते है। हालांकि ये एक जड़ी बूटी है।

ड़ेढ घंटे चढाई करने के बाद हम उडे़री पहुंचे। हमारे फेफडे़ ताजा हवा से भरे हुए थे, और हमें बिल्कुल भी थकान नही हुई थी। उसके छोटे से गाँव में कुछ दस घर ही थे, जिनमें से ज्यादातर उसके रिश्तेदार थे। सभी से मुलाकात करके हमने हरीश की माँ के हाथ का बना खाना खाया और आराम किया।

हमारा पहला दिन आराम करते ही बीता, उठते ही हमें चाय मिली, चाय जिसमें मीठा बिल्कुल नही, बस साथ में खाने के लिए मिठाई। अलग ही अनुभव था चाय का। शाम होते ही खाना परोसा गया, और अंधेरो होते ही हम सोने के लिए बिस्तरों मे घुस गए।

बिनसर महादेव (एड़ादेव)

अगले दिन हरीश हमें पास के एक मंदिर में, जो की पहाड़ की एक ऊंची चोटी पर था (उडेंरी से लगभग 2.5 किमी.), घुमाने ले गया। यह चढ़ाई पहले से आसान थी, या हमें आसान लगी। तब हमारे पास कोडे़क का कैमरा था, और हमने कई यादगार फोटों भी ली पर ज्यादातर खराब हो गई। मंदिर पहुंच कर जो नजारा हमें देखने को मिला वो दर्शनीय था। हमारे सामने थी हिमालय की बर्फ से आच्छादित चोटियां।

धरा पर जन्नत के दर्शन
बर्फ कि सफेद मनमोहक चादर। यूं प्रतीत होता है जैसा देवाताओं का निवास स्थान हो।

हमारा हिमालय से यह पहला साझात्कार था, और शायद यही वजह थी कि हमें वापस आने मै काफी देर हो गई। वापसी में हमने लकड़िया इकठ्ठा करके आग जलाई और चाय बनाई। हरीश ने हमें चीड़ के पेडों की खासयित बताई, जिसके जडों की लकडी एक माचिस की तरह जलती है। चीड़ की लकड़ी में से एक गोंद जैसी द्रव्य निकलता है, जो काफी ज्वलनशील होता है। चलने से पहले हमने यह सुनिश्चित किया कि आग ठीक से बुझ गई है। रात में चांद खिला हुआ था, और तारे इतने सारे थे कि आसमान पूरा भर गया था। हमें टार्च जलाने की जरुरत नही पड़ी।

जंगली मुर्गी का शिकार

अगले दिन हरीश हमें जंगली मुर्गी के शिकार के लिए जंगल में ले गया। हमें उम्मीद थी कि मुर्गी न सही कुछ जानवर तो दिख ही जाएंगे। पर हमें हिरण की पोटी के अलावा किसी जानवर के दर्शन नही हुए। जंगल में पगडंड़ी तक नही थी और एक जगह चढा़ई करने के दौरान अरुण का पैर फिसल गया और मै ठीक उसके पीछे ही था। संभलते हुए उसने एक झाड़ी का सहारा ले लिया, अन्यथा हमारा गिरना तय था। मुर्गी खाने का ख्याल दिल से निकाल कर हमने हरीश के घर का रास्ता पकड़ लिया।

अगले कुछ दिन हरीश हमें अपने रिश्तेदारों के घर घुमाने ले गया, जो कौसानी और दूनागिरी में रहते है। उस यात्रा का वृतांत मै अपने अगले लेख में बताऊंगा। हरीश के साथ उसके घर में रहकर हमें वो अनुभव मिला जो शायद वहां एक यात्री के तौर पर नही मिलता। मैं हमेंशा हरीश का शुक्रगुजार रहूंगा हमें एेसा अवसर देने के लिए।

#Trips with Friends
Share:

Subscribe to Travel Diary - Your Digital Travelogue!!

Get the latest posts delivered right to your inbox.